इमरजेंसी के 45 साल : विजयी घोषित होने के बाद भी आश्वस्त नहीं थे राजनारायण

रायबरेली। आपातकाल के बीच ही 23 जनवरी 1977 को देश मे आम चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। धीरे-धीरे जेल में बंद राजनीतिक बंदियों को भी रिहा किया जाने लगा था। इन सबके बीच हरियाणा के हिसार जेल में बंद राजनारायण के मन मे कुछ और ही चल रहा था, वह एक बार फिर से रायबरेली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनौती देने के लिये बेहद उत्साहित हो रहे थे। इसके लिए उन्होंने वरिष्ठ नेताओं पर दबाब बनाना भी शुरू कर दिया था। अंत में राजनारायण की यह इच्छा भी पूरी हुई और वह एक बार फ़िर वह रायबरेली में इंदिरा गांधी के खिलाफ़ मैदान में थे। चुनाव में उन्होंने इतिहास रचा और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पराजित कर दिया, इससे देश की राजनीतिक दिशा ही बदल गई। आशा हैं हमने ऊपर दी गयी जानकारी से आप संतुष्ट हुए होंगे अगर नहीं तो कृपया कमेन्ट के जरिये हमें बताएं। आज के इतिहास के बारे में और भी जानकारी हो तो वो भी हमें कमेन्ट के जरिये बताये हम इस लेख में जरुर अपडेट करेंगे।
जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे राजनारायण
1977 के चुनाव के परिणाम की घोषणा नहीं हो पा रही थी।इंदिरागांधी के प्रतिनिधि माखनलाल फोतेदार चुनाव अधिकारी विनोद मल्होत्रा पर पुनर्मतगणना का दबाब बना रहे थे, जबकि तीन बार की पुनर्मतगणना हो चुकी थी। कहा जाता है कि इसके पीछे चुनाव अधिकारी विनोद मल्होत्रा पर परिणाम की घोषणा को लेकर भारी दबाब था, जिससे वह काफ़ी व्यथित भी थे।काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में परिणाम की घोषणा हुई। प्रधानमंत्री इंदिरागांधी 52 हजार मतों से पराजित हो चुकी थी। इंदिरा को 1,22,517 वोट मिले थे जबकि राजनारायण 177,719 वोट मिले थे। रायबरेली से देश में नया राजनीतिक इतिहास रचा जा रहा था, लेकिन चारो राजनारायण अब भी शांत थे। चारो तरफ राजनारायण के समर्थकों में जोश था और नारेबाजी शुरू हो गई थी, लेकिन राजनारायण अब भी आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे कि उन्होंने इंदिरागांधी को हरा दिया है।
समर्थकों से उन्होंने कहा कि जब तक आल इंडिया रेडियो से परिणाम की घोषणा नहीं हो जाती वह नहीं मानते। तभी उनके चुनाव प्रबंधन से जुड़े सर्वोदयी नेता रविन्द्र सिंह चौहान रेडियो लेकर आये और उन्होंने राजनारायण को उनके जीत की रेडियो पर चल रही ख़बर को उन्हें सुनाया तब जाकर वह माने। इस सम्बंध में रविन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि इंदिरा गांधी का पराजित होने की ख़बर पर कांग्रेस समर्थकों को तो छोड़िये, विरोधियों को भी भरोसा नहीं हो पा रहा था। उस दौर में कोई उनके हारने की सोच भी नहीं सकता था। चौहान के अनुसार लेकिन राजनारायण ने यह किया और वह भी जनता की बदौलत।
साधन से नहीं जनता के बल पर लड़ा गया था चुनाव
राजनारायण के चुनाव सहयोगी रविन्द्र सिंह चौहान के अनुसार लोगों के पास न पोस्टर थे और न गाड़ी और झंडे। लोग खुद ही हाथ से झंडे रंगकर लगाते थे। पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी रायबरेली में राजनारायण के चुनाव प्रभारी थे, वह लगातार आम लोगों से मिलते रहते थे और कार्यकर्ताओं को जोड़ते थे लेकिन जब सभा आदि करने की बात आती थी तो लोग पीछे हट जाते थे। उस समय लोग इतना डरते थे कि सामने ही नहीं आते थे। रविन्द्र सिंह चौहान इसका जबाब देते हुए कहते हैं कि उस समय सत्ता का प्रभाव और स्थानीय प्रभावशाली लोगों के असर से कोई सामने नहीं आता था। चौहान के अनुसार लोगों को प्रलोभन व दबाब बनाने की हर कोशिश की गई, उन्हें स्वयं कई बार पैसे का प्रलोभन दिया गया।रायबरेली की जनता पूरे मनोयोग से राजनारायण के साथ थी और वह वर्षों की गांधी परिवार की विरासत को भी तोड़ना चाहती थी जिसे उसने राजनारायण को जिताकर वह भी कर दिखाया था।

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