गांधी नहीं चाहते थे पटेल बनें भारत के पहले प्रधानमंत्री, ये थी वजह

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की 69वीं पुण्यतिथि है. 1947 में भारत की आज़ादी के बाद पहले तीन साल उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे थे. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि भारत की आजादी के बाद ये कैसे तय हुआ था सरदार पटेल नहीं बल्कि जवाहर लाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री चुने जाएंगे. लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन आज ही 15 दिसंबर, 1950, महाराष्ट्र में हुआ था.

जब मोदी ने कहा- ‘पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो भारत की तस्वीर कुछ और होती’

एक मंच को संबोधित करते भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘हर भारतीय के मन में आज तक इस बात की कसक है कि देश के पहले प्रधानमंत्री सरदार पटेल नहीं बने. अगर पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो भारत की तस्वीर कुछ और होती.’

अब सवाल यहां ये उठता है आखिर किन कारणों से सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए और उन्हें उप प्रधानमंत्री के पद से ही संतोष होना पड़ा. माना जाता जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस में थे, तब तक तो ऐसा नहीं हो पाता.

ऐसे मिला भारत को पहला प्रधानमंत्री

15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली. 1946 में ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन प्लान बनाया, जिसके तहत कुछ अंग्रेज अधिकारियों को ये जिम्मेदारी मिली कि वे भारत की आजादी के लिए भारतीय नेताओं से बात करें. फैसला ये हुआ कि भारत में एक अंतरिम सरकार बनेगी. उस समय भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे.

1946 की बैठक

प्रधानमंत्री की तलाश के लिए अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान सहित कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे.

आपको बता दें, मौलाना अब्दुल कलाम कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के पद को छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन महात्मा गांधी के कहने पर उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा जिसके बाद महात्मा गांधी पंडित नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे. क्योंकि उस दौर में वह एक लोकप्रिय नेता थे.

बता दें, उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियां करती थी. ऐसे में किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने जवाहर लाल नेहरू का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित नहीं किया था. 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का और बची हुई 3 कमेटियों ने बैठक में तब पार्टी के महासचिव आचार्य जे बी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया गया था.

ऐसे में ये तय था कि कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सरदार पटेल के पास ज्यादा लोगों की सहमति है. इसी साथ दूर- दूर तक जवाहर लाल नेहरू का नाम नहीं था.

महात्मा गांधी के दबाव में आया नेहरू का नाम

महात्मा गांधी ही थे जो नेहरू को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहते थे. इसके बाद आचार्य कृपलानी को कहना पड़ा, ‘बापू की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं जवाहर लाल का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित करता हूं.’ यह कहते हुए आचार्य कृपलानी ने एक कागज पर जवाहर लाल नेहरू का नाम खुद से प्रस्तावित कर दिया था.

महात्मा गांधी के दवाब के कारण पटेल ने भी मान लिया था नेहरू ही अगले प्रधानमंत्री बनेंगे. बता दें, गांधी ने अध्यक्ष पद के लिए सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव नहीं दिया था. महात्मा गांधी ने वजह बताते हुए कहा था कि “जवाहर लाल नेहरू बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अंग्रेजी हुकूमत से बेहतर तरीके से समझौता वार्ता कर सकते थे”.

वहीं 2 अक्टूबर, 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा था कि ‘अब महात्मा हमारे बीच नहीं रहे हैं नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैर-वफादार सिपाही नहीं हूं.’

ये सभी प्रमाण लेखक रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘भारत गांधी के बाद’ और कुछ अन्य स्रोतों पर आधारित है.

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