‘जयशंकर प्रसाद का वह उपन्यास जो असमय मृत्यु के कारण अधूरा रह गया”

आधुनिक हिंदी साहित्य जब किशोर हो रहा था उस समय जयशंकर प्रसाद का जन्म साल 1890 में काशी में हुआ था। आर्थिक संपन्नता के वातावरण में पले-बढ़े प्रसाद का विषाद और करुण भावनाओं के तट पर आना तब होता है, जब 12 साल की उम्र में पिता का साया उनके सर से उठ जाता है। कुछ ही साल बाद माता की भी मृत्यु से काशी के समृद्ध सुंघनी साहू परिवार का यह वंशज घोर आर्थिक संकट के झंझावातों के फेर में पड़ता है।

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कहते हैं कविता व्यथा की पुत्री है। महज़ 9 साल की अवस्था से ही लेखन में रमे जयशंकर प्रसाद ने भी अपनी जीवन-पीड़ा का आलम्ब लेकर तमाम दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक काव्य रचे। हालांकि, प्रसाद के परिवार को उनका लिखना पसंद नहीं आता था इसलिए जयशंकर कलाधर हो जाते हैं और इसी नाम से लेखन जारी रहता है। बड़े भाई का भी असमय निधन होने के बाद जयशंकर प्रसाद संन्यास की ओर भी प्रेरित होते हैं लेकिन कहा जाता है कि विधवा भाभी के अनुनय-विनय पर वह सांसारिक जीवन में वापस लौट आते हैं। हालांकि, यह लौटना समूचा नहीं हो पाता है क्योंकि प्रसाद की रचनाएं और उनका शेष जीवन बताता है कि वो केवल देह से वापस आए हैं। उनका मन तो कहीं संन्यासी ही हो गया है।

साल 1918 में प्रसाद की पहली रचना ‘चित्राधार’ प्रकाशित हुई। इसमें उनकी ब्रज कविताएं शामिल हैं। हिंदी साहित्य में उनके पूर्ववर्ती भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी गद्य को खड़ी बोली से समृद्ध तो किया लेकिन पद्य में वह ब्रज भाषा लेखन के रथ से नहीं उतर पाए थे। बहुत लंबे समय तक हिंदी खड़ी बोली का हिंदी काव्य से साक्षात्कार नहीं हुआ था। हिंदी का यह इंतज़ार तब खत्म हुआ जब जयशंकर प्रसाद ने ‘आंसू’ लिखी। इसे हिंदी पद्य साहित्य का पहला ऐसा काव्य संग्रह माना जाता है जो खड़ी बोली हिंदी में लिखी गई है लेकिन जयशंकर प्रसाद को हिंदी साहित्य के इतिहास में इस युगांतकारी परिवर्तन के अलावा भी कई कारणों से याद किया जाता रहा है। इन्हीं में से एक मज़बूत कारण है ‘कामायनी’।

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47 साल जीने वाले जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ को जीवन के आखिरी दिनों में लिखा था। इसे जयशंकर प्रसाद की उपलब्धि से ज़्यादा हिंदी साहित्य की उपलब्धि के लिए जाना जाए तो किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। ‘कामायनी’ मानवता के मनोविज्ञान का अद्भुत शास्त्र है। ज्ञान, भाव और कर्म की बुनियाद पर लिखे इस महाकाव्य में मानव के देवत्व पर श्रेष्ठता की उद्घोषणा का भी संकेत मिलता है। ‘कामायनी’ के पहले सर्ग चिंता में ही यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरु, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नंददुलारे वाजपेयी प्रसाद पर लिखे अपने लेख में बताते हैं कि कामायनी की शुरुआत ही आदर्शवादी देवसृष्टि के विध्वंस के साथ होती है। इस विध्वंस में देव-सृष्टि विनष्ट हो जाती है और मानव सृष्टि का आरंभ होता है। प्रथम मानव मनु है जो उन अमर देवों का वंशज है, जो प्रलय में मर गए हैं। प्रसाद कामायनी के शब्दों से कहना चाहते हैं कि जब देव-सृष्टि विनष्ट होती है तब मानव-सृष्टि आकार लेती है।

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साल 1936 में प्रकाशित हुए इस महाकाव्य में प्रसाद ने प्रथम मानव मनु के माध्यम से तकरीबन संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का विस्तृत व्याख्यान लिखा है। कुल 15 सर्गों वाली कामायनी का हर सर्ग किसी स्थान, घटना या पात्र के नाम के शीर्षक के साथ आरंभ होने की बजाय मानव मन की वृत्तियों के आधार पर होती है।

छायावाद की समस्त प्रवृत्तियां प्रसाद की ‘कामायनी’ में सम्पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। वही, अगर आप निराला में छायावाद के प्रतीक-चित्रों की खोज करेंगे तब आपको उनका समूचा साहित्य उलटना पड़ेगा। यही छायावाद के अन्य स्तंभ-लेखकों के साथ भी है। तमाम विद्वान जयशंकर प्रसाद में बुद्ध का अंश देखते हैं। जीवन में इतने प्रिय लोगों का असमय दुनिया छोड़कर चले जाना प्रसाद को मृत्यु-व्यथा के प्रश्नों की ओर लेकर जाता है। इन्हीं सवालों के जवाब में ‘आंसू’ और ‘झरना’ की सृष्टि होती है।

इस करुणा कलित ह्रदय में एक विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती।

प्रसाद घोर आधुनिक कवि हैं। उनकी रचनाओं में आधुनिक प्रश्नों के जवाब तलाशने और सामाजिक वैषम्य पर सवाल उठाने की घटनाएं विशेष रूप से मिलेंगी। बौद्ध दर्शन की ओर झुके प्रसाद ने बुद्धकालीन चरित्रों से दो चीज़ें सीखीं। पहली तो अहिंसा और करुणा भाव। दूसरा स्त्री-सम्मान। प्रसाद ने तात्कालिक सामाजिक परिस्थितियों को आधार मानकर स्त्री-विषयक आधुनिक सवाल उठाकर स्वयं की दूरदर्शिता का परिचय भी दिया है।

नारी तुम केवल श्रद्धा हो

श्रद्धा के बिना जीवन निर्वाह असंभव है। ‘कामायनी’ यही बताती है। आप ‘कामायनी’ के सर्गों पर जाएंगे तो पहला सर्ग है चिंता। सृष्टि की चिंता कि पुनर्निर्माण कैसे हो? चिंता के बाद उपजती है आशा। उसके बाद श्रद्धा। श्रद्धा के बिना आशा की कल्पना नहीं हो सकती। श्रद्धा कामायनी की महिला पात्र है, जो कामायनी है। श्रद्धा से अलग हो जब कामायनी का नायक मनु इड़ा यानि की बुद्धि की ओर प्रयाण करता है तभी उसे दुखों से दो-चार होना पड़ता है।

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बुद्धि की अति होने से महत्वकांक्षाओं में भी बढ़ोतरी होती है। मनु पहले तो इड़ा के साम्राज्य में मंत्री होता है लेकिन फिर वह सम्राट बनने का दुःसाहस करता है। यही उसके पतन की वजह बनने लगती है। अंत में उसे कामायनी के संसर्ग से ही राहत मिलती है। यह स्पष्ट करता है कि प्रसाद अति-बुद्धिवाद यानि कि बुद्धि के एकांगी विकास पर सहमत नहीं थे। वह जीवन में सुख-दुख की समरसता का दर्शन कामायनी में स्थापित करने के प्रयास में लगे दिखाई देते हैं।

प्रसाद की रचनाओं में घोर दार्शनिक तत्वों का समावेश है लेकिन इससे वह अपने युग की प्रगतिशील चेतना से दूर नहीं हुए। उनकी कहानियों में उत्थानमूलक प्रसंगों की प्रचुरता है। उनके द्वारा स्थापित आदर्शों में यथार्थ का मिश्रण है। उनकी कहानियों, कविताओं और नाटकों के केंद्र में अधिकांशतः सामाजिक पृष्ठ पर हाशिये पर स्थित लोगों की चर्चा है।

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‘कामायनी’ में जहां नायिका श्रद्धा की अतिरिक्त महत्ता है वहीं कंकाल में उन्होंने रुढ़िबद्ध जाति-प्रतिष्ठा के विरुद्ध कलम चलाई है। उनका एक अन्य उपन्यास तितली मज़दूरों और किसानों के जीवन-चित्र से सज्जित है। उपन्यास की नायिका तितली एक किसान पुत्री है जिसके माध्यम से प्रसाद ने ग्राम्य-नवनिर्माण संबंधी अपने विचार रखे हैं। हिंदी साहित्य में आधुनिक चेतना के प्रभात काल में नारी-स्थिति पर प्रसाद काफी मुखर हैं। प्रसाद के तत्कालीन सवाल आधुनिक नारी-विमर्श की धुरी हैं तो इससे जयशंकर प्रसाद की दूरदर्शी सर्जनात्मक क्षमता और अपने युग से आगे की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का संकेत मिलता है।

तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की
समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारों की।

या

मैं जभी तौलने का करती उपचार, स्वयं तुल जाती हूं
भुज लता फंसाकर नर-तरू से झूले-सी झोंके खाती हूं।

उनकी ज़्यादातर रचनाओं में पौराणिक या ऐतिहासिक आख्यानों का सहारा लिया गया है लेकिन इससे प्रसाद ने पुरातनपंथ और रुढ़िवाद को पोषण देने की बजाए आधुनिक निष्कर्ष निकालकर सही अर्थों में प्रगतिशील, पुष्ट और प्रतिभाशाली लेखन का परिचय दिया है। प्रसाद की गैर-पौराणिक या गैर-ऐतिहासिक रचनाओं में भी कल्पना की अंध उड़ान नहीं है। उनकी समस्त कृतियों में जीवनानुभवों के निष्कर्षों का दस्तावेज है।

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साहित्यिक जीवन से इतर प्रसाद का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही सरल था। पुत्र, पत्नी और भाभी के सम्मिलन से उनका परिवार बनता था। प्रसाद बड़े ही सामाजिक थे लेकिन गोष्ठियों, समारोहों इत्यादि में भाग लेने से कतराते थे। साहित्य की लगभग हर विधा नाटक, उपन्यास, कविता, निबंध और ग़जल इत्यादि में हाथ आजमाने वाले प्रसाद किसी की भी पुस्तक की भूमिका लिखने में बिल्कुल रूचि नहीं रखते थे।

इस संबंध में तो उन्होंने उपन्यास सम्राट ‘प्रेमचंद’ तक की पैरवी ठुकरा दी थी। नाटकों में प्रसाद की प्रतिभा खुलकर सामने आई है। जैसे मुंशी प्रेमचंद ‘उपन्यास सम्राट’ कहे जाते हैं वैसे ही प्रसाद को भी ‘नाटक सम्राट’ कहा जा सकता है। उनके तमाम नाटक ऐतिहासिक आख्यानों पर आधारित हैं।

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अंग्रेज़ों की गुलामी के दौर में जब राष्ट्रीय स्वाभिमान और आज़ादी की चेतना के जागरण वाली रचनाओं पर सरकारी निगरानी और दंड-विधान का अत्याचार चरम पर था, तब प्रसाद इस काम के लिए ऐतिहासिक आख्यानों का ही सहारा लेते हैं। नाटक ‘चंद्रगुप्त’ एक हिस्से में यवन आक्रमणकारी सेल्यूकस भारत की ओर कूच करता है। इसी कथा का आधार लेकर प्रसाद तक्षशिला की राजकुमारी अलका के शब्दों में भारतवासियों का आह्वान करते हैं –

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो, बढ़े चलो।

जीवन-दर्शन, आध्यात्मिकता के अलावा राष्ट्रीय भावनाएं भी प्रसाद साहित्य का श्रृंगार हैं। उन्हें अपने देश से प्रेम है। इसी प्रेम के अधीन प्रसाद भारत को अनजान क्षितिज को प्राप्त किनारा और लघु सुरधनु-से पंख पसारे खगों का नीड़ घोषित करते हैं।

लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल-मलय समीर सहारे
उड़ते खग जिस ओर मुंह किए समझ नीड़ निज प्यारा।
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक किनारा।

प्रसाद का जीवन बहुत संक्षिप्त रहा है। उनका अंतिम उपन्यास इरावती उनके असामयिक निधन के चलते अधूरा रह गया। साल 1937 के नवंबर की 15 तारीख को प्रसाद सदेह इहलोक से प्रयाण कर गए। इस समय तक उनकी उम्र महज़ 47 साल रही थी। लेकिन अल्प जीवनकाल में ही जयशंकर प्रसाद ने जो कुछ भी हिंदी साहित्य को सौंपा, वह उनकी अखंड, अजर और अमर कीर्ति का प्रमाणपत्र है। उनकी कृति ‘कामायनी’ को विश्व साहित्य की सदी की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। श्यामनारायण ने इसे विश्व साहित्य का 8वां महाकाव्य घोषित किया है। वहीं, प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने कामायनी को ‘हिंदी के ताजमहल’ की संज्ञा दी है।

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