भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान् क्रांतिकारी भाई परमानन्द

भाई परमानन्द भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। भाई जी बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे जहाँ आर्यसमाज और वैदिक धर्म के अनन्य प्रचारक थे, वहीं इतिहासकार, साहित्यमनीषी और शिक्षाविद् के रूप में भी उन्होंने ख्याति अर्जित की थी। सरदार भगत सिंह, सुखदेव, पं॰ राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, करतार सिंह सराबा जैसे असंख्य राष्ट्रभक्त युवक उनसे प्रेरणा प्राप्त कर बलि-पथ के राही बने थे।

देशभक्ति, राजनीतिक दृढ़ता तथा स्वतन्त्र विचारक के रूप में भाई जी का नाम सदैव स्मरणीय रहेगा। आपने कठिन तथा संकटपूर्ण स्थितियों का डटकर सामना किया और कभी विचलित नहीं हुए। आपने हिंदी में भारत का इतिहास लिखा है। इतिहास-लेखन में आप राजाओं, युद्धों तथा महापुरुषों के जीवनवृत्तों को ही प्रधानता देने के पक्ष में न थे। आपका स्पष्ट मत था कि इतिहास में जाति की भावनाओं, इच्छाओं, आकांक्षाओं, संस्कृति एवं सभ्यता को भी महत्व दिया जाना चाहिए। आपने अपने जीवन के संस्मरण भी लिखे हैं जो युवकों के लिये आज भी प्रेरणा देने में सक्षम हैं।

जीवन चरित
भाई जी का जन्म 4 नवम्बर, 1876 को जिला जेहलम (अब पाकिस्तान में) के करियाला  ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिताजी का नाम भाई ताराचन्द्र था। इसी पावन कुल के भाई मतिदास ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर जी के साथ दिल्ली पहुंचकर औरेंग्जेब  की चुनौती स्वीकार की थी। सन् 1902 में भाई परमानंद ने शिक्षा प्राप्त करके लाहोर के दयानंद एंग्लो महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए।

अफ्रीका  में वैदिक धर्म पर व्याख्यान देने के लिए सन् 1905 में भाई जी अफ्रीका पहुंचे। डर्बन में भाई जी की गाँधी जी से भेंट हुई। अफ्रीका में उस समय अप्रवासी भारतियों को ईसाई बनाने का जोर था. भाई जी के भाषणों से चेतना का प्रसार हुआ और ईसाई धर्म अंतरण पर रोक लगी. वहा से भाई जी लन्दन चले गए। वहां उन दिनों श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा तथा सावरकर जी क्रांतिकारी कार्यों में सक्रिय थे। भाई जी दोनों के सम्पर्क में आए।

भाई जी सन् 1907 में भारत लौट आए। दयानंद वैदिक महाविद्यालय में पढ़ाने के साथ-साथ वे युवकों को क्रांति के लिए प्रेरित करने के कार्य में सक्रिय रहे। सरदार अजित सिंह और लाला लाजपत जी  से उनका निकट का सम्पर्क था। इसी दौरान लाहौर पुलिस उनके पीछे पड़ गई। सन् 1910 में भाई जी को लाहौर में गिरफ्तार कर लिया गया। किन्तु शीघ्र ही उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसके बाद भाई जी अमरीका चले गए तथा वहां उन्होंने प्रवासी भारतीयों में वैदिक (हिन्दू) धर्म का प्रचार किया। लाला जी के आदि के साथ वे भारत की स्वाधीनता के लिए भी प्रयासरत रहे। करतार सिंह सराबा, विष्णु गणेश पिंगले तथा अन्य युवकों ने उनकी प्रेरणा से अपना जीवन भारत की स्वाधीनता के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। 1913 में भारत लौटकर भाई जी पुन: लाहौर में युवकों को क्रांति की प्रेरणा देने के कार्य में सक्रिय हो गए।

भाई जी द्वारा लिखी पुस्तक, “तवारीख-ए-हिन्द” तथा उनके लेख युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करते थे। 25 फरवरी, 1915 को लाहौर में भाई जी को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके विरुद्ध अमरीका तथा इंग्लैंड में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध षड्यंत्र रचने, करतार सिंह सराबा तथा अन्य अनेक युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करने, आपत्तिजनक साहित्य की रचना करने जैसे आरोप लगाकर फाँसी की सजा सुना दी गई। सजा का समाचार मिलते ही देशभर के लोग उद्विग्न हो उठे। अन्तत: भाई जी की फांसी की सजा रद्द कर उन्हें आजीवन कारावास का दण्ड देकर दिसम्बर, 1915 में अण्दमान (कालापानी) भेज दिया गया। उधर भाई जी जेल में अमानवीय यातनाएं सहन कर रहे थे, इधर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती भाग्यसुधि धनाभाव के बावजूद पूर्ण स्वाभिमान और साहस के साथ अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही थीं।

अंडमान की काल कोठरी में भाई जी को गीता के उपदेशों ने सदैव कर्मठ बनाए रखा। जेल में श्रीमद्भगवद्गीता सम्बंधी लिखे गए अंशों के आधार पर उन्होंने बाद में “मेरे अन्त समय का आश्रय- गीता ” नामक ग्रंथ की रचना की। गांधीजी को जब कालापानी में उन्हें अमानवीय यातनाएं दिए जाने का समाचार मिला तो उन्होंने 19 नवम्बर 1919 के “यंग इंडिया” में एक लेख लिखकर यातनाओं की कठोर भर्त्सना की। सी फ अंद्रेव्स  द्वारा उनकी रिहाई की भी मांग की गई । 20 अप्रैल, 1920 को भाई जी को कालापानी जेल से मुक्त कर दिया गया।

कालेपानी की कालकोठरी में पांच वर्षों में भाई जी ने जो अमानवीय यातनाएं सहन कीं, भाई जी द्वारा लिखित “मेरी आपबीती” पुस्तक में उनका वर्णन पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। प्रो. धर्मवीर  द्वारा लिखित “क्रांतिकारी भाई परमानंद” ग्रंथ में भी इन यातनाओं का रोमांचकारी वर्णन दिया गया है।

जेल से मुक्त होकर भाई जी ने पुन: लाहौर को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। लाला लाजपतराय भाई जी के अनन्य मित्रों में थे। उन्होंने “नेशनल कालेज” की स्थापना की तो उसका कार्यभार भाई जी को सौंपा गया। इसी कालेज में भगतसिंह व सुखदेव आदि पढ़ते थे। भाई जी ने उन्हें भी सशस्त्र क्रांति के यज्ञ में आहुतियां देने के लिए प्रेरित किया। भाई जी ने वीर बंद बैरागी ” पुस्तक की रचना की, जो पूरे देश में चर्चित रही।

कांग्रेस तथा गांधी जी ने जब मुस्लिम तुष्टीकरण की घातक नीति अपनाई तो भाई जी ने उसका कड़ा विरोध किया। वे जगह-जगह हिन्दू संगठन के महत्व पर बल देते थे। भाई जी ने “हिन्दू” पत्र का प्रकाशन कर देश को खंडित करने के षड्यंत्रों को उजागर किया। भाई जी ने सन् 1930 में ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि मुस्लिम नेताओं का अंतिम उद्देश्य मातृभूमि का विभाजन कर पाकिस्तान का निर्माण है। भाई जी ने यह भी चेतावनी दी थी कि कांग्रेसी नेताओं पर विश्वास न करो, ये विश्वासघात कर देश का विभाजन कराएंगे। जब भाई जी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई तथा भारत विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा हुई और लाखों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया जिससे भाई जी के हृदय में एक ऐसी वेदना पनपी कि वे उससे उबर नहीं पाए तथा 8 दिसम्बर, 1947 को उन्होंने संसार से विदा ले ली।

कृतियाँ

भाई जी द्वारा लिखित “हिन्दू संगठन”, “भारत का इतिहास”, “दो लहरों की टक्कर”, “मेरे अंत समय का आश्रय- गीता “, “पंजाब का इतिहास”, “वीर बन्दा वैरागी”, “मेरी आपबीती” “हमारे राष्ट्र पुरुष “आदि साहित्य आज भी इस महान विभूति की पावन स्मृति को अक्षुण्ण रखे हुए हैं।भारत का इतिहास ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर ली थी.

आशा हैं हमने ऊपर दी गयी जानकारी से आप संतुष्ट हुए होंगे अगर नहीं तो कृपया कमेन्ट के जरिये हमें बताएं। आज के इतिहास के बारे में और भी जानकारी हो तो वो भी हमें कमेन्ट के जरिये बताये हम इस लेख में जरुर अपडेट करेंगे।

 

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