मेजर सोमनाथ शर्मा जीवनी – Biography of Somnath Sharma in Hindi Jivani

मेजर सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे जिन्होने अक्टूबर-नवम्बर, १९४७ के भारत-पाक संघर्ष में अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये। उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया। परमवीर चक्र पाने वाले वे प्रथम व्यक्ति हैं।

31 जनवरी 1923 को जम्मू में जन्मे मेजर सोमनाथ शर्मा ने 22 फरवरी 1942 को भारतीय सेना में चौथी कुमायूं रेजीमेंट में बतौर कमीशंड अधिकारी प्रवेश लिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर सोमनाथ शर्मा का फौजी कार्यकाल शुरू ही द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ, जब उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया। 3 नवंबर 1947 मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बडगाम मोर्चे पर जाने का आदेश दिया गया। जब दुश्मन के 500 सैनिकों ने तीन तरफ से भारतीय सेना को घेरकर हमला शुरू कर दिया, तब मेजर शर्मा ने दुश्मन बहादुरी से मुकाबला किया।

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मेजर की सेना के कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और काफी कम संख्‍या में सैनिक बचे थे। मेजर सोमनाथ का बायां हाथ भी चोटिल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं माने। वे मैग्जीन में गोलियां भरकर सैनिकों को देते गए, लेकिन दुर्भाग्य से वे दुश्मन के एक मोर्टार का निशाना बन गए और वीरगति को प्राप्त हुए। अंतिम समय में भी वे अपने सैनिकों का सामना करने के लिए हौसला बढ़ाते रहे। मेजर सोमनाथ परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।

15 अगस्त, 1947 को भारत के स्वतन्त्र होते ही देश का दुखद विभाजन भी हो गया। जम्मू कश्मीर रियासत के राजा हरिसिंह असमंजस में थे। वे अपने राज्य को स्वतन्त्र रखना चाहते थे। दो महीने इसी कशमकश में बीत गये। इसका लाभ उठाकर पाकिस्तानी सैनिक कबाइलियों के वेश में कश्मीर हड़पने के लिए टूट पड़े।

वहाँ सक्रिय शेख अब्दुल्ला कश्मीर को अपनी जागीर बनाकर रखना चाहता था। रियासत के भारत में कानूनी विलय के बिना भारतीय शासन कुछ नहीं कर सकता था। जब राजा हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान के पंजे में जाते देखा, तब उन्होंने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये।

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इसके साथ ही भारत सरकार के आदेश पर सेना सक्रिय हो गयी। मेजर सोमनाथ शर्मा की कम्पनी को श्रीनगर के पास बड़गाम हवाई अड्डे की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गयी। वे केवल 100 सैनिकों की अपनी टुकड़ी के साथ वहाँ डट गये। दूसरी ओर सात सौ से भी अधिक पाकिस्तानी सैनिक जमा थे। उनके पास शस्त्रास्त्र भी अधिक थे; पर साहस की धनी मेजर सोमनाथ शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उनका आत्मविश्वास अटूट था। उन्होंने अपने ब्रिगेड मुख्यालय पर समाचार भेजा कि जब तक मेरे शरीर में एक भी बूँद खून और मेरे पास एक भी जवान शेष है, तब तक मैं लड़ता रहूँगा।

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दोनों ओर से लगातार गोलाबारी हो रही थी। कम सैनिकों और गोला बारूद के बाद भी मेजर की टुकड़ी हमलावरों पर भारी पड़ रही थी। 3 नवम्बर, 1947 को शत्रुओं का सामना करते हुए एक हथगोला मेजर सोमनाथ के समीप आ गिरा। उनका सारा शरीर छलनी हो गया। खून के फव्वारे छूटने लगे। इस पर भी मेजर ने अपने सैनिकों को सन्देश दिया – इस समय मेरी चिन्ता मत करो। हवाई अड्डे की रक्षा करो। दुश्मनों के कदम आगे नहीं बढ़ने चाहिए….।

पिता और मामा का प्रभाव

मेजर सोमनाथ का कीर्तिमान एक गौरव की बात भले ही हो, उसे आश्चर्यजनक इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उनके परिवार में फौजी संस्कृति एक परम्परा के रूप में चलती रही थी। इनके पिता यदि चाहते तो एक डॉक्टर के रूप में लाहौर में अपनी प्रैक्टिस जमा सकते थे, किंतु उन्होंने इच्छापूर्वक भारतीय सेनिकों की सेवा करना चुना। पिता के अतिरिक्त मेजर सोमनाथ पर अपने मामा की गहरी छाप पड़ी। उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे तथा 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हुए थे।

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भारत-पाकिस्तान युद्ध (1947)

3 नवम्बर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का हुकुम दिया गया। 3 नवम्बर को प्रकाश की पहली किरण फूटने से पहले मेजर सोमनाथ बदगाम जा पहुँचे और उत्तरी दिशा में उन्होंने दिन के 11 बजे तक अपनी टुकड़ी तैनात कर दी। तभी दुश्मन की क़रीब 500 लोगों की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीन तरफ से घेरकर हमला किया और भारी गोला बारी से सोमनाथ के सैनिक हताहत होने लगे। अपनी दक्षता का परिचय देते हुए सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा। इस दौरान उन्होंने खुद को दुश्मन की गोली बारी के बीच बराबर खतरे में डाला और कपड़े की पट्टियों की मदद से हवाई जहाज को ठीक लक्ष्य की ओर पहुँचने में मदद की।

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एक हाथ से चलाते रहे गोलियां

उधर कबाइलियों की हजारों की संख्या कत्ले-आम करती हुई बरामूला तक पहुंच गई थी. उनको लगा कि उनका रास्ता साफ है. तभी उन्हें पता चला कि भारतीय सेना श्रीनगर हवाई-अड्डे पर लैंड करने वाली है. यह खबर उनको परेशान करने वाली थी. वह भारतीय सेना को रोकना चाहते थे, इसलिए वह तेजी से श्रीनगर की ओर बढ़ गये.

शायद, उन्हें नहीं पता था कि बडगाम में एक पोस्ट पर सोमनाथ अपने कुछ साथियों के साथ तैनात थे. उन्हें दुश्मन के द्वारा औचक हमला होने की स्थिति में हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकना था. दोपहर तक दुश्मन की तरफ से कोई हलचल नहीं हुई तो सोमनाथ की टीम को लगा कि दुश्मन ने शायद अपना प्लान बदल दिया. वह इससे ज्यादा कुछ और सोचते इससे पहले एक बड़ी संख्या में कबाइलियों ने उनकी पोस्ट पर तीन तरफ से हमला कर दिया.

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दुश्मन संख्या में बहुत ज्यादा थे. उन्हें रोकना आसान नहीं था. बावजूद इसके सोमनाथ ने अपने साथियों में जोश भरते हुए कहा कि हमें सेना से मदद आने तक इनको किसी भी कीमत पर रोकना होगा. उन्हें इस बात का इल्म था कि अगर श्रीनगर एयरपोर्ट पर दुश्मन का कब्जा हो गया तो, उनका आगे का काम आसान हो जायेगा.

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