वर्ल्‍ड सुसाइड प्रिवेंशन डे – केवल निजी नहीं, सामाजिक कारण भी होते हैं आत्महत्या के पीछे

वर्ल्‍ड सुसाइड प्रिवेंशन डे यानी आत्महत्या की रोकथाम करने का दिन। वैसे तो इस मौके पर संयुक्त राष्‍ट्र के तत्वावधान में दुनिया के 70 देशों में तमाम जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, लेकिन सच तो यह है कि सुसाइड की रोकथाम तभी संभव है, जब लोगों को एक बेहतर माहौल दिया जाये। ऐसा माहौल, जिसमें इंसान केवल एक बेहतर जीवन जीने के बारे में सोचे। विशेषज्ञों की मानें तो आत्महत्या के पीछे केवल निजी कारण नहीं होते, सामाजिक अस्थिरता भी एक बड़ा कारण है।

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झक्कास खबर
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हर साल दुनिया में कितने लोग आत्महत्या करते हैं, उससे कहीं ज्यादा समझने की जरूरत है, कि समाज में ऐसा क्या किया जाये, कि लोग अपनी जिंदगी को खत्म करने के बारे में सोचें तक नहीं। इसी बात को समझने के लिए हमने हज़रतबल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कश्‍मीर, श्रीनगर के एक शोध को उठाया, तो कई ऐसी बातें निकल कर आयीं, जिनसे मुखातिब होने के बाद हर कोई यही कहेगा, कि जम्मू-कश्‍मीर में अनुच्‍छेद 370 और 35 एक हटाना बेहद जरूरी था। यह अध्‍ययन कहीं न कहीं इस बात की ओर भी इशारा कर रहा है कि आने वाले समय में घाटी में आत्महत्या के आंकड़ों में गिरावट जरूर आयेगी, हालांकि घाटी में यह सिलसिला शुरू हो चुका है।

आखिर कश्‍मीर ही क्यों? दरअसल जब हम किसी परिवर्तन की बात करते हैं, तो सजीव उदाहरण के साथ उसकी पुष्टि भी करनी जरूरी होती है। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्‍मीर इस वक्त बहुत बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। परिवर्तन के परिणाम लोगों की दृष्टि में कैसे होंगे, इसके लिए सरकार ने और आम जनता ने पहले से पैमाने सेट कर रखे हैं। उन्हीं में से एक पैमाना आत्महत्या का भी है।

बीते वर्षों की बात करें तो 2018 की तुलना में वर्ष 2019 में जम्मू -कश्‍मीर में सुसाइड में 13.9 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। 2018 में 330 लोगों ने सुसाइड किया तो 2019 में यह संख्‍या 284 रहा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार घाटी में 33 प्रतिशत आत्‍महत्‍याओं का कारण अज्ञात रहा। 14 प्रतिशत ने बेरोजगारी की वजह से और 13 प्रतिशत ने पारिवारिक समस्‍याओं की वजह से अपनी जान ली। आपको बता दें कि एनसीआरबी के इस डाटा में 5 अगस्‍त 2019 के बाद के आंकड़े भी शामिल हैं। लेकिन केवल 370 का हटाया जाना ही आत्‍महत्‍या में गिरावट का कारण है, यह कहना अभी जल्‍दबाजी होगी। इसके लिए एक नज़र हम विश्‍वविद्यालय में किए गए शोध पर डालते हैं।

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कश्‍मीर विश्‍वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में 2011 में शोधार्थी शम सुन निसा ने एक अध्‍ययन किया, जिसका विषय था, “सुसाइड इन कश्‍मीर : ए सोशियोलॉजिकल स्टडी”। यानी इस अध्‍ययन में घाटी में आत्‍महत्या के पीछे के सामाजिक कारणों को खोजने के प्रयास किए गए। शोध के निष्‍कर्ष पर जाने से पहले आपको बता दें, कि जिस वक्‍त यह शोध किया गया तब घाटी में आतंकवाद चरम पर था, हजारों की संख्‍या में मासूम युवा गुमराह हो कर आतंकवाद का रास्‍ता अख्‍त‍ियार कर लेते थे। यह वो समय था जब कश्‍मीर में राजनीतिक अस्थिरिता कतई नहीं थी, यानी तत्कालीन सरकार के पास घाटी में परिवर्तन का पूरा मौका था।

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शोध के निष्‍कर्ष कुछ इस प्रकार हैं-

> शोध के अनुसार उस दौरान आत्महत्या करने वालों में सबसे ज्यादा यानी 47.66% गैरशादीशुदा युवा थे, जबकि 19.67% शादीशुदा। विधवा महिलाओं द्वारा आत्महत्या करना आम बात थी।

> आत्‍महत्‍या करने वालों में 47.66 प्रतिशत लोग डिप्रेशन यानी मानसिक अवसाद का शिकार थे। जबकि 42.66% में अवसाद के लक्षण नहीं मिले। इससे यह मान लिया गया कि डिप्रेशन ही सुसाइड का सबसे बड़ा कारण है।

> आत्महत्या करने वालों में 79% में मृतक में किसी भी प्रकार की मानसिक बीमारी नहीं होने के संकेत मिले, जबकि 14.34% किसी न किसी मानसिक बीमारी से ग्रसित थे। यानी कि अगर कोई डिप्रेशन से गुजर रहा है, तो जरूरी नहीं है कि उसके अंदर इसके लक्षण दिखाई ही दें। मतलब ऊपर से हँसता हुआ व्‍यक्ति अंदर से कितना परेशान है, इसका अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता है।

> शोध में जम्मू-कश्‍मीर के युवाओं में डिप्रेशन के कई सारे सामाजिक कारण भी पाये गए, जिसमें घाटी की सामाजिक परिस्‍थितियों को मुख्‍य रूप से जिम्मेदार माना गया।

> शोध के अनुसार 5.67 प्रतिशत आत्महत्याओं के पीछे शराब को जिम्मेदार पाया गया, जबकि 7 प्रतिशत ऐसे थे, जो ड्रग्स व अन्‍य प्रतिबंधित नशीले पदार्थों का सेवन करते थे। यानी कि 85 प्रतिशत युवाओं ने अपनी जान किसी प्रकार के नशे की वजह से नहीं ली।

> आत्महत्या के तरीके की बात करें तो 66 प्रतिशत ने जहर खाकर जान दी, जबकि 11 प्रतिशत ने खुद को जला लिया।

> 42 प्रतिशत लोगों ने आर्थिक कारणों से आत्महत्या की। जबकि 13 प्रतिशत ने बेरोजगारी की वजह से और 11 प्रतिशत ने व्‍यापार में हानि या बिजनेस नहीं चल पाने की वजह से अपनी जान ली।
> आत्महत्या के प्रमुख कारण- घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, पति की मृत्यु, बेरोजगारी, गरीबी, कर्ज, आदि भी थे।

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शोध के अंत में कहा गया कि सामाजिक अस्‍थिरता, अपराध, हत्यारों का खुले आम घूमना, भ्रष्‍टाचार, आदि ऐसे सामाजिक कारण हैं, जिनकी वजह से लोग आत्महत्या के लिए प्रेरित होते हैं। शोधकर्ता ने अंत में लिखा कि एक बेहतर सामाजिक माहौल प्रदान करने से आत्महत्या के मामलों को रोका जा सकता है।

जम्मू-कश्‍मीर पर किए गए इस अध्‍ययन के निष्‍कर्षों को अगर आप आज के परिवेश से जोड़ कर देखें तो कहीं न कहीं एक उम्मीद जरूर दिखाई देगी, जहां केंद्र शासित राज्य में युवाओं को रोजगार प्रदान करने के लिए तमाम योजनाएं चलायी जा रही हैं। नौकरियों व व्‍यापार की बंदिशें खत्म कर दी गई हैं। अपराध और आतंकवाद का खात्म करने के लिए सख्‍त कदम उठाये जा रहे हैं।

बिजनेस ठप होना, जो आत्‍महत्‍या के एक कारणों में से एक था, अब स्‍वरोजगार के लिए युवाओं को विशेष ट्रेनिंग देने की व्‍यवस्‍था की जा रही है। गरीबी दूर करने के लिए गरीब किसानों के लिए ऑर्गेनिक खेती और केसर की खेती पर बल दिया जा रहा है। और ऊपर जो आपने पढ़ा कि युवाओं में सुसाइड का सबसे बड़ा कारण डिप्रेशन था, तो उससे लड़ने के लिए घाटी में खेल के मैदान खिलाड़‍ियों के साथ-साथ खेलप्रेमियों से गुलज़ार होने लगे हैं। हालांकि कोरोना के चलते फिलहाल खेल गतिविधियां बंद हैं, लेकिन वो दिन दूर नहीं, जब फिर से कश्‍मीर के फुटबॉल खिलाड़ी ऐसी किक मारेंगे कि गेंद सीधे गोलपोस्‍ट में जाकर गिरेगी।

 

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