CCS पेंशन रूल्स-1972 और समय पूर्व रिटायरमेंट पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

केंद्र सरकार ने अपने सभी विभागों से उन कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड्स की समीक्षा के लिए कहा है, जो सेवा में 30 साल पूरे कर चुके हैं। कार्मिक मंत्रालय के आदेश के अनुसार विभागीय कार्यों को गति देने, अर्थव्यवस्था के चलते और प्रशासन में दक्षता लाने के लिए मूल नियमों ‘एफआर’ और सीसीएस (पेंशन) रूल्स-1972 में समय पूर्व रिटायरमेंट देने का प्रावधान है।

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि समय पूर्व रिटायमेंट का मतलब जबरन सेवानिवृत्ति नहीं है, यह ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ से अलग है जो केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 के तहत निर्दिष्ट शास्तियों या सजाओं में से एक है। सरकार किसी सरकारी कर्मचारी की आयु 50/55 वर्ष होने या 30 वर्ष की सेवा पूरी होने के बाद किसी भी समय जनहित में उसे समय पूर्व सेवानिवृत्त कर सकती है। लेकिन इस पुराने नियम पर लोगों को क्या है आपत्ति और सरकार किस आधर पर करेगी इसके क्रियान्वयन इस पर एक्सपर्ट्स के साथ खास चर्चा की।

कार्मिक मंत्रालय
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1972 में ही बनाया गया था ये नियम

समय पूर्व रिटायरमेंट को लेकर आशंका, विरोध क्यों हो रहा है इस बारे में भारत सरकार में DoPT के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा कहते हैं ये कोई पहली बार नहीं है बल्कि इससे पहले भी कई बार समीक्षा हो चुकी है, लेकिन इससे पहले जो समीक्षा होती थी, उससे बहुत ज्यादा लोगों को नौकरी से सेनावृत्ति नहीं की गई। इसलिये कई लोगों को ये नियम नया लग रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है, कार्मिक मंत्रालय ने भी साफ किया है कि जो भी नियम है 1972 के तहत लिया गया है।

सिविल कर्मचारी के पास है बात रखने के मौके

वहीं कई लोगों का कहना है कि कुछ लोगों को इसमें आधार बना कर या निशाना बना कर भी ऐसा किया जा सकता है। इस बारे में उन्होंने कहा कि हमारे संविधान के प्रावधान के मुताबिक सिविल सेवा में आये किसी भी कर्मचारी और अधिकारी अगर सरकार के साथ काम कर रहा है और परमांनेंट कर्मचारी हैं तो उससे संबंधित कोई फैसला लिया जाता है तो उसकी बात सुनने का मौका दिया जाता है। फिर भी अगर संतुष्टी या न्याय नहीं मिला तो इसके लिये न्यायिक प्रक्रिया भी है, हाइकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट है।

जहां तक अभी सरकार ने समीक्षा की बात है, सर्कुलर अभी जारी किया गया है, सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है, बल्कि इस नियम के तहत अभी समीक्षा होगी उसके बाद कोई फैसला लेगी। लेकिन ये बात जरूरी है कि जो समीक्षा हो न्याय पूर्वक और कमेटी के सदस्य पूर्वाग्रही न हो, जो मान दंड हो उसके अनुरूप ही फैसला लेंगे।

 

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रिटायरमेंट देना दंडात्मक कार्रवाई नहीं

समय पूर्व रिटायरमेंट देने के लिये क्या प्रावधान रखा गया है इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की वकील तालीश रे कहती हैं कि फंडामेंटल रूल 56J और L हैं, इसके अलावा रूल 48, पेंशन सीसीएस रूल्स 1972 हैं, जिसके तहत ये फैसला लिया गया है। इसमें एक कमेटी बनाया जायेगा, जो रिव्यू करेगी। कई अलग-अलग कैटेगरी के तहत समीक्षा की जायेगी। अगर लगता है कि किसी में कार्यशैली, या उनकी प्रामाणिकता, ईमानदारी उस आधार पर सही नहीं है तो उनका रिव्यू किया जायेगा, इसके अलावा कब वो रिटायर होने वाला है या पांच साल तक का काम रिव्यू होगा। उनके सर्विस रिकॉर्ड, एसीआर, परफॉर्मेंस, पर्सनल फाइल आदि भी देखा जायेगा। अगर उन्हें रिटायर करने का फैसला किया जायेगा तो पहले उन्हें भी अपनी बात कहने का मौका दिया जा सकता है। इसके अलावा ये कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं है बल्कि अगर कोई काम नहीं कर पा रहा है, या उस काम के लिये अक्षम है तो उसको रिव्यू करके, अगर परेशानी दूर नहीं हो पायेगी तो उन्हें रिटायर कर दिया जायेगा। इसमें उन्हें कोई पेंशन संबंधित या किसी तरह की समस्या नहीं आयेगी।

सिर्फ चरित्र पंजिका के आधार पर न हो फैसला

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में डीआईपीपी पूर्व सचिव अजय शंकर कहते हैं कि इसे लेकर पहले भी कई बार नोटिफिकेशन आता रहा है, लेकिन क्रियान्वयन नहीं पाया। इसे समझ सकते हैं कि एक चाय की दुकान पर किसी अधिकारी की चर्चा की जाय तो उनके चरित्र और कार्य का प्रमाण मिल जाता है और सही तस्वीर सामने आ जाती है। जबकि सरकारी रिकॉर्ड देखें तो चरित्र पंजिका में सबका काफी अच्छा ही रहता है। अगर शिकायत होती है तो जांच कर दूर कर लिया जाता है। ऐसे में जब ऐसे नियम आते हैं तो आशंका होती है कि सही ढंग से नियम लागू होगा या नहीं। पूर्वाग्रह और पारदर्शिता की कमी की वजह से ऐसे लोग न चले जायें जिन्हें नहीं जाना था। लेकिन अगर ये सिस्टम हर साल करें तो काफी सुधार होगा, जो काम करने वाले हैं उन्हें भरोसा होगा कि निष्ठा से काम करने वालों को लोगों को भी परेशानी नहीं होगी।

खासकर जो लोग सरकारी नौकरी को सिर्फ नौकरी लेते हैं सेवा भाव से नहीं देखते हैं ऐसे लोगों की जगह कर्मनिष्ठ लोग आयेंगे। इसलिये बहुत जरूरी है रिकॉर्ड खंगालना। साथ ही पारदर्शिता निर्धारित करें कि अगर कोई पूछे कि किस आधार पर उन्हें घर भेज रहे हैं, तो बता सकें।

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360 डिग्री तक जांच जरूरी

वहीं ने सत्यानंद मिश्रा ने बताया कि देश भर से कई आईपीएस और आईएएस अधिकारी केंद्र सरकारी में सेवा के लिये जाते हैं। लेकिन उससे पहले सरकार पूरा 360 डिग्री पर उनकी छानबीन करती है। जैसे अगर कैरेक्टर बुक देखती है जो कि आउट स्टैंडिंग, एक्सीलेंट और बेस्ट रहा है लेकिन अगर ज़मीनी स्तर पर उसका काम प्रभावशाली नहीं है तो ऐसे लोगों को नहीं लेती। यानी अब चरित्र पंजिका के अलावा 360 डिग्री तक जांच करने के बाद ही सूची बनाई जायेगी। क्योंकि देखें तो अक्सर कोई अधिकारी किसी का कैरेक्टर रोल लिखता है तो सामने वाला कहने लगता है कि सर ठीक से देना, ये पद्धति वर्षों से चली आ रही है। लेकिन जल्दी ही इसमें बदलाव आयेगा, साथ ही लोगों का भी अधिकारियों या कर्मचारियों को लेकर जो रवैया है कि ये भी वैसा ही होगा और विश्वास कम हो रहा है उसे जोड़ने की जरूरत है। इसलिये ये सभी सुधारात्मक कदम उठाये जा रहे हैं। किसी से दुश्मनी और परेशान करने के मकसद से नहीं किया जा रहा है।

 

 

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