कौन हैं वीर सावरकर, पढ़िए कुछ दिलचस्प किस्से

राष्ट्र चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने संकल्प पत्र में विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर – Veer Savarkar) को भारत रत्न दिलाने का वादा किया है। इस वादे के साथ ही सावरकर को लेकर चर्चाओं का दौर एक बार फिर से शुरू हो गया है। कुछ लोग इसके पक्ष में हैं तो कुछ विरोध में।

कौन हैं वीर सावरकर? उन्हें भारत रत्न देने की बात का विरोध क्यों किया जा रहा है? सावरकर देश व देशवासियों के लिए ‘हीरो’ और ‘विलेन’ दोनों कैसे बन गए? इन सवालों के जवाब जानने के लिए आगे पढ़ें।

1883 में मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में जन्मे वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे। इसके साथ ही वह एक राजनेता, वकील, लेखक और हिंदुत्व दर्शनशास्त्र के प्रतिपादक थे। मुस्लिम लीग के जवाब में उन्होंने हिंदु महासभा से जुड़कर हिंदुत्व का प्रचार किया था।
वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था।

साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठे दिन विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया था। हांलाकि उन्हें फरवरी 1949 में बरी कर दिया गया था।

विशेषज्ञ नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, “हम नहीं भूल सकते कि गांधी हत्याकांड में उनके खिलाफ केस चला था। वो छूट जरूर गए थे, लेकिन उनके जीवन काल में ही उसकी जांच के लिए कपूर आयोग बैठा था और उसकी रिपोर्ट में शक की सुई सावरकर से हटी नहीं थी।”
नासिक कलेक्टर की हत्या के सिलसिले में गिरफ्तारी

अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर को पुणे के फरग्यूसन कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था। साल 1910 में उन्हें नासिक के कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया था।

सावरकर पर शोध करने वाले निरंजन तकले बताते हैं, “1910 में नासिक के जिला कलेक्टर जैकसन की हत्या के आरोप में पहले सावरकर के भाई को गिरफ्तार किया गया था। सावरकर पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से अपने भाई को एक पिस्टल भेजी थी, जिसका हत्या में इस्तेमाल किया गया था।”

अंडमान में ‘काला पानी’ और अंग्रेजों को माफीनामा
इसके बाद करीब 25 सालों तक सावरकर किसी न किसी रूप में अंग्रेजों के कैदी रहे। उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं और सजा काटने के लिए भारत से दूर अंडमान यानी ‘काला पानी’ भेज दिया गया। लेकिन यहां से सावरकर की दूसरी जिंदगी शुरू होती है। सेल्युलर जेल में उनके काटे 9 साल 10 महीनों ने अंग्रेजों के प्रति सावरकर के विरोध को बढ़ाने के बजाय समाप्त कर दिया।

निरंजन तकले बताते हैं, “गिरफ्तार होने के बाद असलियत से उनका सामना हुआ। 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफीनामा लिखा। इसके बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेजों को माफी पत्र दिए। कई कारणों से उन्हें जेल में अन्य कैदियों की तुलना में कई रियायतें भी मिलीं।” सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, “अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता।”

सावरकर की हिंदुत्व की अवधारणा
अंडमान से वापस आने के बाद सावरकर ने एक पुस्तक लिखी ‘हिंदुत्व – हू इज हिंदू?’ (Hindutva – Who is Hindu) जिसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया।

निलंजन मुखोपाध्याय बताते हैं, “हिंदुत्व को वो एक राजनीतिक घोषणापत्र के तौर पर इस्तेमाल करते थे। हिंदुत्व की परिभाषा देते हुए वो कहते हैं कि इस देश का इंसान मूलत: हिंदू है। इस देश का नागरिक वही हो सकता है जिसकी पितृ भूमि, मातृ भूमि और पुण्य भूमि यही हो।”

अंग्रेजों के साथ समझौता
निरंजन  तकले बताते हैं, “सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है- गाँधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना। अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपये महीना।”

राम बहादुर राय कहते हैं, “दरअसल सावरकर पर आखिरी दिनों में जो कलंक लगा, उसने उनकी विरासत पर अंधकार का बादल डाल दिया। अंडमान की जेल में रहते हुए पत्थर के टुकड़ों को कलम बना कर जिसने 6000 कविताएं दीवार पर लिखीं और उन्हें कंठस्थ किया। लेकिन इसके बावजूद जब सावरकर महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ जाते हैं, वह समाप्त हो जाते हैं।”

निरंजन तकले कहते हैं, “मैं सावरकर की जिंदगी को कई भागों में देखता हूं। उनकी जिंदगी का पहला हिस्सा रोमांटिक क्रांतिकारी का था, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई पर किताब लिखी थी। इसमें उन्होंने बहुत अच्छे शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की वकालत की थी।”

‘पोलराइजिंग फिगर’
1966 में अपनी मृत्यु के कई दशकों बाद भी भारतीय राजनीति में वीर सावरकर एक ‘पोलराइजिंग फिगर’ हैं। या तो वे आपके हीरो हैं या विलेन।
सावरकर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य नहीं रहे। लेकिन संघ परिवार में उनका नाम बहुत इज्जत व सम्मान के साथ लिया जाता है।

भाजपा की आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा कि इंदिरा गांधी भी सावरकर की इज्जत करती थीं और इंदिरा गांधी ने सावरकर के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था। अब वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने भी ऐसा ही कुछ कहा है। रंजीत सावरकर ने कहा कि “इंदिरा गांधी वीर सावरकर का सम्मान करती थीं, मुझे महसूस होता है कि वह उनका अनुसरण (फॉलो) भी करती थीं, क्योंकि वह पाकिस्तान को घुटनों पर ले आयीं थी, उन्होंने सेना को मजबूत किया और विदेशी संबंधों को दृढ़ता दी। उन्होंने परमाणु परीक्षण भी किया। यह सब नेहरु और गांधी की विचारधारा के खिलाफ था।”

रंजीत सावरकर ने बताया कि “सावरकर उम्मीद करते थे कि जो लोग संसद पहुंचते हैं, वो अपनी जाति, धर्म और लिंग आदि को संसद के बाहर छोड़ दें। आपको सावकर जितना सेक्यूलर आदमी आसानी से नहीं मिलेग।” इससे पहले भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी ट्वीट कर बताया कि इंदिरा गांधी ने साल 1970 में वीर सावरकर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। साथ ही इंदिरा गांधी ने अपने निजी खाते से 11,000 रुपए सावरकर ट्रस्ट को दान किए थे।

सामने आई इंदिरा की चिट्ठी

एक तरफ मनमोहन सिंह का बयान सामने आया तो दूसरी ओर एक चिट्ठी भी सामने आई है, जिसने कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया. 20 मई 1980 को लिखी एक चिट्ठी में इंदिरा गांधी ने वीर सावरकर को भारत का सपूत बताया था और आजादी के आंदोलन में उनके योगदान को सराहा था. इंदिरा गांधी ने ये चिट्ठी वीर सावरकर ट्रस्ट को लिखी थी.

eheb_wfu4aakpbx_101819020536.jpgसामने आई थी इंदिरा की लिखी चिट्ठी

क्यों बदला कांग्रेस का रुख?

दरअसल, जिस तरह नरेंद्र मोदी ने इस मसले को अपने रुख में करने का काम किया और हर जनसभा में इस पर बोलना शुरू किया तो इससे ये संदेश गया कि ये मामला बीजेपी के पक्ष में जा सकता है. वीर सावरकर महाराष्ट्र से ही थे, ऐसे में वहां ये मसला वोटरों को प्रभावित कर सकता है. यही कारण है कि आक्रामक रही कांग्रेस के इस मसले पर अब तेवर ढीले पड़ते दिख रहे हैं.

 

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